हाल ही में दिल्ली में हुए क्लाउड सीडिंग के असफल प्रयास ने एक बार फिर कृत्रिम वर्षा और उसके इर्द-गिर्द घूमती बहस को गरमा दिया है। लेकिन क्या यह सिर्फ मौसम की बेरुखी थी, या इसके पीछे कुछ गहरे वैज्ञानिक, प्रशासनिक और नैतिक सवाल छिपे हैं? यह लेख इस विफलता को वैज्ञानिक, नैतिक और राजनीतिक संदर्भ में विस्तार से समझने की कोशिश करता है।
जल वाष्प से कृत्रिम वर्षा तक - मूल विज्ञान को समझना
हम अक्सर मौसम विभाग (IMD) की वेबसाइट पर सैटेलाइट इमेजेस में "जल वाष्प (Water Vapour)" की तस्वीरें देखते हैं। ये तस्वीरें दरअसल वायुमंडल की ऊपरी परतों में मौजूद नमी या गैसीय पानी की मात्रा को दर्शाती हैं। चमकीला सफेद रंग अधिक नमी को इंगित करता है, जबकि गहरा रंग शुष्क हवा को दर्शाता है। ये इमेजेस मौसम वैज्ञानिकों को हवा के बहाव और नमी के वितरण को समझने में मदद करती हैं, जो वर्षा के पूर्वानुमान के लिए महत्वपूर्ण है।
यहीं से क्लाउड सीडिंग की बुनियाद रखी जाती है। क्लाउड सीडिंग का मूल विचार बादलों में मौजूद इसी नमी को कृत्रिम रूप से वर्षा में बदलना है। इसके लिए सिल्वर आयोडाइड जैसे रासायनिक कणों को बादलों में छोड़ा जाता है, जो जल वाष्प को बड़ी बूंदों या बर्फ के क्रिस्टल में संघनित होने में मदद करते हैं, जिससे वर्षा होती है।
लेकिन, क्या केवल नमी का होना ही पर्याप्त है?
विज्ञान और भ्रम - जब 'सफेद क्षेत्र' भी काम न आए
हमारी चर्चा में यह स्पष्ट हुआ कि जल वाष्प इमेज पर दिखने वाला सफेद क्षेत्र (उच्च नमी) क्लाउड सीडिंग के लिए केवल एक आवश्यक शर्त है, पर्याप्त नहीं। क्लाउड सीडिंग के लिए बादल के अंदर कुछ और विशिष्ट शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है:
- सुपरकूल्ड लिक्विड वॉटर (SLW) की उपस्थिति: बादल में पानी की ऐसी बूंदें होनी चाहिए जो 0°C से नीचे के तापमान पर भी तरल अवस्था में हों।
- आदर्श तापमान: बादलों के ऊपरी हिस्से का तापमान आमतौर पर 0°C से -20°C के बीच होना चाहिए।
- पर्याप्त बादल मोटाई: वर्षा बनने के लिए बादलों का ऊपर से नीचे तक पर्याप्त मोटा होना आवश्यक है, ताकि बूंदों को बढ़ने और गिरने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
- मजबूत अपड्राफ्ट (Updraft): बादल के भीतर ऊपर की ओर उठने वाली हवा की गति पर्याप्त होनी चाहिए, ताकि नमी और सीडिंग एजेंट ऊपर जाकर ठंडे क्षेत्रों तक पहुँच सकें।
इसलिए, यदि क्लाउड सीडिंग विफल हो जाती है और संस्थाएँ यह कहकर पल्ला झाड़ती हैं कि "बादलों में पर्याप्त पानी नहीं था," तो यह एक कमजोर बहाना है। क्योंकि एक विशेषज्ञ संस्था के पास IMD जैसे स्रोतों से प्राप्त डेटा (रडार, मौसम गुब्बारे) के माध्यम से इन सभी जानकारियों का पता पहले ही लग जाना चाहिए था। नमी की कमी का मतलब है कि उनका शुरुआती आकलन ही गलत था।
नैतिक और राजनीतिक पहलू - विशेषज्ञता की विफलता और संस्थागत समझौता - दिल्ली का संदर्भ
दिल्ली में क्लाउड सीडिंग का प्रयास, जिसमें IIT कानपुर जैसी प्रतिष्ठित संस्था और IMD जैसे आधिकारिक डेटा प्रदाता शामिल थे, लेकिन फिर भी विफल रहा, कई गहरे सवाल खड़े करता है।
जब किसी परियोजना में IIT कानपुर जैसी देश की प्रमुख तकनीकी और वैज्ञानिक अनुसंधान संस्था और IMD (भारत मौसम विज्ञान विभाग) जैसे राष्ट्रीय मौसम डेटा के आधिकारिक स्रोत शामिल हों, तो विफलता के लिए "बादलों में पानी नहीं था" जैसे कारण बताना केवल एक बहाना बन जाता है।
इन संस्थाओं की विशेषज्ञता का स्तर और उसकी जिम्मेदारी:
IMD
विशेषज्ञता: मौसम डेटा का संग्रह और विश्लेषण: उच्च-रिज़ॉल्यूशन मौसम रडार, सैटेलाइट इमेजरी (जल वाष्प सहित), और मौसम गुब्बारों के माध्यम से वायुमंडलीय साउंडिंग डेटा प्रदान करना। दुनिया के टॉप मौसम विभागों में इसका नाम और काम माना जाता है।
सवाल: इनकी विशेषज्ञता से नमी, तापमान प्रोफ़ाइल, और बादलों की मोटाई का सटीक डेटा प्राप्त होता है। यदि डेटा ने पानी की कमी दिखाई, तो परियोजना शुरू ही क्यों की गई? इनकी डेटा की विशेषज्ञता पर सवाल उठाना ही गैरवाजिब जान पड़ता है।
IIT कानपुर
एडवांस्ड रिसर्च और मॉडलिंग: मौसम विज्ञान, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग और उन्नत संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान (NWP) मॉडल्स का उपयोग करके IMD के डेटा का विश्लेषण करना।
इनकी विशेषज्ञता का उपयोग सीडिंग के आदर्श समय, स्थान और आवश्यक मात्रा का सटीक अनुमान लगाने में होना चाहिए था। विफलता सीधे तौर पर इनके मॉडलिंग और विश्लेषण में गंभीर त्रुटि को दर्शाती है।
इन दोनों संस्थाओं की विशेषज्ञता को मिलाकर, क्लाउड सीडिंग के लिए अनुकूलतम स्थिति की पहचान करना असंभव नहीं, बल्कि एक मानक प्रक्रिया है।
यह विफलता केवल "पानी की कमी" या "गलत तापमान" जैसे आसान स्पष्टीकरणों से परे जाती है। ये आशंका बिल्कुल सही है कि एक विशेषज्ञ संस्था के लिए ये कारण बताना स्वीकार्य नहीं है। असली कारण कहीं अधिक जटिल हो सकते हैं, जिनका पता डेटा के गहन विश्लेषण से चलता है:
- डेटा विश्लेषण में त्रुटि: हो सकता है कि IIT कानपुर के विशेषज्ञों ने IMD के डेटा (नमी, तापमान) का विश्लेषण करने में गलती की हो या उनके पूर्वानुमान मॉडल विफल रहे हों, जिससे उन्होंने गलत अनुमान लगाया कि बादल उपयुक्त थे।
- परिचालन की त्रुटियाँ: संभव है कि सीडिंग एजेंट को बादल के गलत हिस्से में छिड़का गया हो (जहाँ SLW नहीं था), या छिड़काव का समय गलत चुना गया हो।
- अपर्याप्त क्लाउड डायनेमिक्स: शायद बादल में मजबूत अपड्राफ्ट की कमी थी, जिसके कारण सीडिंग एजेंट प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाया और वर्षा बनने से पहले ही बूँदें वाष्पीकृत हो गईं।
- तेजी से वायुमंडलीय बदलाव: हालांकि यह कुछ हद तक अप्रत्याशित हो सकता है, लेकिन तेजी से बदलते मौसम के पैटर्न को भी आधुनिक उपकरणों से ट्रैक किया जा सकता है।
ये सभी कारण सीधे तौर पर संस्था के आकलन की गुणवत्ता और परिचालन दक्षता पर सवाल उठाते हैं।
राजनीतिक दबाव और संस्थागत समझौता
यहीं से राजनीतिक और नैतिक पहलू सामने आता है। ये एक आशंका को भी जन्म देता है कि कहीं किन्हीं निहित स्वार्थ के कारण तो हमारी तकनीक और देश की साख को दांव पर लगाया गया:
- राजनीतिक नेतृत्व का दबाव: दिल्ली में प्रदूषण संकट और उस समय छठ पूजा तथा बिहार चुनावों के कारण, सत्तारूढ़ दल पर तत्काल कुछ 'करते हुए दिखने' का अत्यधिक दबाव था। इस दबाव ने एक 'फेक आर्टिफिशियल रेन' का माहौल बनाया।
- वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा का पतन: IIT और IMD जैसी संस्थाओं ने, फंडिंग या राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देते हुए, वैज्ञानिक डेटा की परवाह किए बिना (या गलत व्याख्या करते हुए) सीडिंग के लिए सहमति दी।
- निष्कर्ष: विफलता के बाद "पानी नहीं था" जैसे साधारण कारण बताना, उनकी गहरी वैज्ञानिक विफलता और राजनीतिक दबाव के सामने नैतिक समर्पण को छुपाने का प्रयास था। यह केवल विज्ञान की हार नहीं, बल्कि संस्थागत नैतिक पतन को दर्शाता है।
नैतिक और राजनीतिक पहलू - जब विज्ञान बन जाए सियासत का हथियार
इस तरह की विफलता के पीछे केवल वैज्ञानिक या तकनीकी कारण नहीं होते, बल्कि राजनीतिक दबाव और नैतिक समझौता भी एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। दिल्ली की हालिया घटना में यह पहलू और भी प्रासंगिक हो जाता है:
- 'फेक आर्टिफिशियल रेन' का माहौल: जब राजनीतिक नेतृत्व जनता को प्रभावित करने या किसी समस्या (जैसे प्रदूषण) पर तत्काल कार्रवाई दिखाने के लिए 'कृत्रिम वर्षा' का माहौल बनाता है, तो वह संस्थाओं पर दबाव डाल सकता है कि वे वैज्ञानिक शर्तों की परवाह किए बिना परियोजना को आगे बढ़ाएँ। मीडिया संस्थान कोई सवाल पूछने की बजाय सिर्फ गुणगान करने को ही अपना धर्म मान कर इस माहौल को बनाते हैं।
- संस्थागत समझौता: IIT कानपुर और IMD जैसी प्रतिष्ठित संस्थाएँ, जब राजनीतिक दबाव में आकर वैज्ञानिक डेटा को नज़रअंदाज़ करती हैं और सीडिंग के लिए 'हाँ' कहती हैं, तो यह उनकी गंभीर नैतिक विफलता है। वे वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा के बजाय राजनीतिक इच्छा को प्राथमिकता देती हैं।
- दिल्ली की संवेदनशीलता: छठ पूजा और बिहार चुनाव: क्लाउड सीडिंग का यह प्रयास ऐसे समय में हुआ जब दिल्ली में छठ पूजा का पवित्र त्योहार था और बिहार में चुनाव नज़दीक थे, जिसे दिल्ली की सत्तारूढ़ पार्टी ने "करो या मरो" का सवाल बना रखा था। ऐसे में, प्रदूषण नियंत्रण में सफलता एक बड़ा राजनीतिक संदेश हो सकती थी। विफलता का कारण 'पानी की कमी' बताना, इस राजनीतिक खेल और नैतिक विफलता को छुपाने का एक प्रयास हो सकता है।
संक्षेप में, यह केवल विज्ञान की विफलता नहीं थी, बल्कि वैज्ञानिक नैतिकता पर राजनीतिक दबाव के हावी होने की विफलता थी।
निष्कर्ष: सफलता का मूल्यांकन - जिम्मेदारी तय करने का आधार
ऐसी विफलताओं से बचने और भविष्य में जिम्मेदारी तय करने के लिए, हमें क्लाउड सीडिंग की सफलता या विफलता का मूल्यांकन करने के लिए कड़े वैज्ञानिक मापदंडों का पालन करना होगा। केवल "बारिश हुई या नहीं" कहना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक इन मापदंडों का उपयोग करते हैं:
- भौतिक साक्ष्य: सीडिंग के बाद बादल के भीतर बर्फ के क्रिस्टल की सांद्रता में वृद्धि, सुपरकूल्ड लिक्विड वॉटर (SLW) में कमी, और वर्षा में रासायनिक ट्रेसर का पता लगाना।
- सांख्यिकीय साक्ष्य: सीडिंग वाले 'टारगेट' क्षेत्र और बिना सीडिंग वाले 'कंट्रोल' क्षेत्र में वर्षा की मात्रा की सांख्यिकीय तुलना। लंबे समय तक किए गए प्रयोग अधिक विश्वसनीय होते हैं।
- परिणाम साक्ष्य: वर्षा की मात्रा में वास्तविक वृद्धि (रेन गेज और रडार से मापी गई) और जल स्रोतों (जलाशयों, हिमपात) में प्रत्यक्ष वृद्धि।
इस योजना की विफलता को सिर्फ एक बारिश नहीं होना नहीं माना जा सकता। ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी तकनीक पर सवाल खड़े करता है कि आखिर हम इस बेसिक स्तर पर गलती कैसे कर सकते हैं? यदि बादलों में नमी थी ही नहीं हो सबसे बेसिक चीज है तो इस योजना पर कार्य क्यों किया गया? क्यों तकनीक, साख, और जनता के भरोसे को दांव पर लगाया गया।
दिल्ली की घटना हमें यह सिखाती है कि किसी भी वैज्ञानिक परियोजना, खासकर जब उसमें जनता का पैसा और उम्मीदें जुड़ी हों, तो पारदर्शिता, वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा और नैतिक जवाबदेही सर्वोपरि होनी चाहिए। बहानेबाजी के बजाय, संस्थाओं को स्पष्ट वैज्ञानिक डेटा और विश्लेषण के साथ विफलता के वास्तविक कारणों को सामने लाना चाहिए। यह केवल विज्ञान को ही नहीं, बल्कि उस पर जनता के विश्वास को भी बहाल करेगा।
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